Tuesday, December 9, 2008

माफ़ी चाहता हूँ मैं काफी दिनों से आपसब को समय नही दे पा रहा हूँ, दरअसल इधर कुछ दिनों से मेरी जिंदगी कुछ हंगामेखेज बीत रही है इस लिए कुछ समय की तंगी है, जल्द ही कुछ खास के साथ मिलने का वादा करते हुए आपसब से बिदा लेता हूँ,
सचीन

Sunday, July 27, 2008

जज्बा जिगर का

जज्बा जिगर का लो उनसे
सुन लो तुम ऐ नोजवानो
गाथा अपने देश की, लाखों उन शहीदों की
है यहाँ पे बन के हिम्मत, देखलो तुम आज भी
हमे है गर्व,हमे है नाज
हम उनकी संतान है
देश की खातिर हमको भी,अब देनी और लेनी कुछ जान है
वीरगती या विजय नारा था जिनका
वो ही अब हमारा है
न कभी था दुश्मन का, न कभी ये होगा
ये तिरंगा प्यरा देखलो हमारा है
आएगा जो भी लेने इसको आगे
वो दुश्मन हमारा है
सिचा था पहले भी लहू से
एक बार वो सब और सही
ये देश तो हमारा है
तिरंगा प्यरा हमारा है
जज्बा जिगर .....
सचीन

देश के शहीद प्रणाम

हर साल सलामी देते है,
हर दिन सर को झुकाते है,
हर पल याद उन्हें हम करते है,
जो देश पे कुर्बा होते है,
हम हिम्मत उनसे लेते है,
हम जज्बा उनसे लेते है,
आज़ादी जिसने दी हमको
दुश्मन से हमारे लड़े जो
भगत सिंघ,मंगल और गाँधी, उनको ही हम कहते है
जो लाज बचाए माँ की अपनी
बेटा वो ही कहलाता है
अपने देश पे हर बेटा

हस्ते-हस्ते कुर्बान हो जाता है
जो देश के दुश्मन को खदेरे
हम ताक़त उस्को कहते है
है धन्य हर वो माँ, जिस कोख
से ये वीर जनम लेते है
हर साल सलामी ....
हर दिन सर .......

सचीन



Thursday, July 3, 2008

कहाँ हूँ -२

कहाँ हूँ-६
मैं खो गया हूँ, तेरा हो गया हूँ
अब क्या कहूँ, मैं कहाँ हूँ -२
कहाँ हूँ-६
सूरत पे तेरी मैं मर मिटा हूँ
जुल्फों में तेरी मैं खो गया हूँ
कहाँ हूँ-
आँखे है तेरी,कारी मतवारी
सुरतिया लगे है अब हमका प्यारी
कैसे कहूँ की अब हम नही हूं
नसे में तेरी मैं डूबा हुआ हूँ
कहाँ हूँ-6
सचीन

Tuesday, July 1, 2008

तेरे रंग में

तेरे ही रंग में,रंग गया मैं
तेरा ही हो के,रह गया मैं-२
देखा तुझको खो गया मैं-२
देखते ही तेरा हो गया मैं
तेरे रंग.......
बिन तेरे सब बेकार है,
यह दुनिया भी बेजार है
कैसे कहूँ मैं, हाँ कैसे कहूँ
मुझको हो गया प्यार है
तेरे ही रंग................
तेरे रंग के जादू में
तेरे बदन की, खुशबू
हो तेरे रंग के जादू में
तेरे बदन ....
घुल गया-२ मैं
तेरा ही हो के रह गया मैं
तेरे ही ....
जब से मिले हो तुम मुझको जाना,
ख़ुद को ही न पहचाना
हाय ये कशिश,हाय ये अदा -२
हो गया इनपे मैं फ़िदा
अब क्या करू,-२ मैं कुछ तो बता
लूटा तुने मुझे जाने वफ़ा
तेरे.................
सचीन

Sunday, June 22, 2008

बाकि है अभी

आशा की किरने बाकि है अभी
उषा की बूंदे बाकि है अभी
निर्मोही संसार में,
कुछ दिन बाकि है अभी
नास्वर शरीर में चंद सांसे बाकि है अभी
लक्ष्य को पाने की चाहत, में चलना है अभी
जो दूर तो है पर ज्यादा दूर नही
देर से ही सही, पर उसे पाना है अभी
दूर तक चलना पड़े तो चलना है अभी
आशा की .............
सितारों की बिच में चाँद को चमकना है अभी
सितम है चांदनी पे अंधेरों का अभी
सितम की ये काली रात ...........है अभी
चमकता चाँद निकलना है अभी
सचीन

मेरा मकान

मैं दुखी हूँ, उन सभी बातों से
जो मैंने कभी की थी किसी से
या फिर किसी दुसरे ने की थी
कभी कुछ बातें मुझसे
मैं खफा हूँ उनसे जो जन्वारोंको
जानवरों से लडाते है
मगर उनसे ज्यादा दुखी हूँ,मैं उनसे हूँ
जो ख़ुद तो लड़ते है
औरों को भी जानवर की तरह लड़ने को मजबूर कर देते है
मैं दुखी हूँ उन तमाम चीजों से
जो कभी दुनिया में देखि थी
मैंने और अफ़सोस
की अब भी उन्ही चीजों को
देख रहा हूँ, इस धरा पर
शिर्फ़ एक अन्तर के साथ
सभी चीजे पहले से ज्यादा
दुसित हो गई है
फिर भी हमे संतोष नही
और विस भर रहे है हम
मैं ........
सचीन

कल के लिए

रख दिया है मैंने दिल,
कल के लिए
मेरी जा को रख दिया है
तेरे लिए
इंतजार तेरा है मेरा प्यार तेरा है
मेरा प्यार तेरा है -२
रख दिया है प्यार को यार के लिए
रख दिया है ..........
तड़प रहा था,मेरा दिल तेरे लिए,
भटक रहा था, रात में तेरे लिए
दूंदता फिरे ये कहाँ तुमको,
न पूछो यार रहने दो ये भी कल के लिए
रख दिया ....
मेल में,रेल में,
बस में ,कार में,
हर जगह बेकार में,यु ही तेरे प्यार में
भटक रहा था मेरा दिल-२
जाने ये कब से
रख दिया ....
सचीन


Friday, June 20, 2008

तेरा साया

कुछ देर,कुछ दूर,
तेरा साया साथ चलेगा क्या -२
जल रहा हूँ मैं तो कबसे -२
आग में हा इस आग में
मुझे ठंडक देगा क्या तेरा साया
कुछ देर -२
यादों में तेरी, भटक रहा हूँ
बिन तेरे दिलबर जी रहा हूँ
ये न पूछो जी जिंदगी क्या
मोम की तरह पिघल रहा हूँ
मेरे साथ ढलेगा क्या
तेरा साया साथ चलेगा क्या
तेरा साया साथ चलेगा क्या
कुछ देर ...
सचीन

Thursday, June 19, 2008

क्या ऐसा ही ये प्यार है?

बिन तुझे याद किए
आँख मेरी लगती नही
बिन तेरे ख्याल के
मेरी सुबह होती नही
क्या करू मैं गर
मुझे तुमसे जो प्यार है
क्या करू मैं गर
तुमसे जो इक्र्रार है
बिन तुझे -२
ऐसा क्यों होता है मैंने सोचा नही
सुना था पहले पर जाना नही
क्या ऐसा ही ये प्यार है
बिन तुझे -२
सचीन

ऐ शहर वालो

दुआ करो तुम ऐ शहर वालो मेरे लिए
मेरी भी हो सुबह कभी
हो शाम मेरी भी कभी,इसके लिए
दुआ करो----२
तनहा हूँ, मैं कुछ आज-कल, तनहा थे तुम भी कभी
आबाद हो अब तो तुम, अब आबाद करोगे कभी
मुझको भी है उम्मीद
दुआ करो---२
आशाए है पर क्यों साथ तुम्हारा नही, हर पल में बस चिंताए है
बचू इनसे कोई ऐसा ठिकाना नही
फिर भी उमीदो का दामन, थामे आया हूँ मैं तुम्हारे शहर,
ऐ शहर वालो
दुआ करो ।
सचिन

चलेगी दुकान मेरी

चलेगी दुकान मेरी मुझको भरोसा है,
आएगा कस्तम्बर मेरा मुझको भरोसा है,
किसी की तुम सुनो नही,
करो वही जो काम अपना है,-

चलेगी ---२
देर है थोरी पर अंधेरे नही,
नई है दुकान मेरी सब के लिए,-
चाहे कोई कुछ भी कहता रहे,

करू मैं वही जो काम अपना है
चलेगी -१
खाली है अभी, पर जरुर भरेगी
एक दिन कस्तम्बर की लाइन यहाँ लगेगी
मॉल भी होगा, तब मानी भी होगी-2
लाइफ अपनी टेंशन फ्री होगी
चलेगी---२
जितना है कर्जा, सर पे सब मैं उतारूंगा

हंस-हंस -हंस के
लोगों को कर्जा, तब मैं ही दूंगा
मेरी भी तो पुछ होगी बाज़ार में
मेरा भी कोई मुकाम होगा
आएगा शहरमें जो भी bandhaमिल के मुझसे जाएगा
चाहे वो स्टार हो या हो सुपर स्टार
मुझसे मिलने को वो दौरा दौरा चला आएगा
चलेगी ---२
देखते है अभी सब मेरी इस दुकान को
पहुचायेंगे मिल के सब मुझे अपने मुकाम को
मुझको कुछ फ़िक्र नही अपना खुदा अपने साथ है
चलेगी ---२

सचिन

कातिल रात

रात है,हाँ ये रात है,-२
इसमे कोई, बात है,
जो दिखती नही, पर है
कही ये कैसी रात है
रात है .......
राज की ये, बात है, कातिल है हर कोई यहाँ
हर कोई शिकार है, नाम केसब दोस्त है,
दुश्मनी सब में यार है
जाने ये, कैसी बात है
इस बात में कोई, राज है
रात है......
अँधेरी है, काली है,
बड़ी भयानक रात है
तारों का है, शमा कातिल बड़ी ये रात है,
रात है .....
सचिन

Wednesday, June 18, 2008

सदा के लिए

तेरी सूरत मेरी आँखों में बस गई है
सदा के लिए
तेरी खुशबू मेरी सांसो में बस गई है
सदा के लिए
आ आ के मिल जा मुझसे तू
सदा के लिए
बिन तेरे जीना एक होता नही
गुजर जाए पल भी ऐसा होता नही
करू क्या मैं कोई बता दे
मुझे खुदा के लिए

तेरी सूरत --------२
तेरी खुशबू----२
सूरत तेरी इन आँखों में है
फिर भी तुझको दूंदता रहता हूँ मैं
आँखे तेरी नीली है मेरा घर इनकी गली है
इन आँखों में रहने दो मुझे
सदा के लिए

मैंने कभी ये कहा नही...

मैंने कभी ये कहा नही, के मुझे प्यार है तुमसे
पर कहते है लोग ये सब मेरे दोस्त
के मुझे कुछ न कुछ तो हुआ है
मैंने-२
खुदा ही जाने बात क्या है
क्यों इतना ये शोर है
मैंने ये सुना है इश्क पे नही किसी का कोई ज़ोर है
मैंने ---२
मैंने ये किया नही
मैंने कहा नही
पर कहते है लोग
सब मेरे दोस्त
के मुझे कुछ न कुछ तो हुआ है
मैंने ---२
सचिन

मुझे प्यार हो गया है ....

मैं कैसे कहू, की मुझे प्यार हो गया है
पहली बार में, ये दिल निशार हो गया है
खवाब हजारों ये देखने लगा है
जाने-४ ये क्या सोचने लगा है
मैं कैसे -२
बारिश भी है,
शाम का मंजर भी है
जो तू नही, तो कुछ भी नही है
जाने क्यों बेकरार दिल, ऐसे में होने लगा है
मैं कैसे -२
भीर है पर, तन्हाई सी
खुशिया है पर, रुसवाई सी
जाने क्यों मेरे साथ ऐसा होने लगा है
मैं कैसे -२
रातो को नींद अब आती नही,
दिन को चैन कही मिलता नही,
सोचा न था कभी ऐसा होगा
मेरे साथ जो यह होने लगा है
मैं कैसे –2
सचीन

Tuesday, June 17, 2008

जनाबे अली आ ...

जनाबे अली आ,आजा रे-२
हो दिल मेरा,तड़प रहा,
जब से तू, मुझसे दूर रहा-२
जनाबे अली आ .....
हाय क्या गम दिया,
मुझपे सितम किया,
जीना तो जीना मेरा,
मरना भी मुश्किल किया-२
जनाबे अली .........
तेरे लिए,मैं फिरता हूँ, बन के कब से बंजारा
प्यार में सब को लगता है,हो गया हूँ मैं आवारा
आजा,अब तो,आजा
जनाबे अली आ.......
सचिन

जाने खुदा

जाने मेरी जिंदगी में,
प्यार होगा या नही,
चाहे जो मुझे,
दिलदार ऐसा होगा या नही-२
ये तो जाने खुदा,
मैं जानू कुछ भी नही,
इश्क, प्यार मैंने कभी किया ही नही
ढूँढा अपने दिलवर भी मैंने अब तक तो नही
जाने मेरी .............
होगा क्या कल,नही कुछ भी ख़बर
अनजान हूँ मैं है ये नई-नई सी डगर
इस झमेले में तो मैं आऊंगा नही
फिर भी जाने क्यों दिल कहता यही
जाने मेरी ......
तनहा सी है,उदास सी है,
उसके बिना, सुनी सी है,
हाथो में मेरे,कोई हाथ नही,
कदमो के संग,कोई साथ नही
हे जाने मेरी ..................
सचिन





ये जिंदगी

ये जिंदगी,बड़ी मुश्किल भरी है
इसे, जिउ या छोड़ दो
सोचता, हूँ कभी, इन सांसो की डोर को,
रखु या फिर तोड़ दु ,
ये जिंदगी......... -२
उदास है,सुनी सी है,
ये रात मेरी, अधूरी सी है -२
छुटी हुई सी बात कोई
कुछ कमी है जो, जिंदगी उदास है
खोई-खोई सी बड़ी अजीब सी ये रात है
ये जिंदगी .........
सचिन


क्वारे के

बिन तेरे सहारे के,दिन कटते नही कवारे के -२
राते सुनी लगती है, फीके लगते है तारे-2
बिन तेरे ...........
आओ-आओ, आ भी जाओ ,
आ के हमसे, मिल भी जाओ-२
बिन तेरे ..........
सुना-सुना है आलम,
खोया-खोया मौसम है-२
अधूरे दिखते है नज़ारे
बिन तेरे ......
सचिन

मैं क्या करू .........

मैं क्या करू,तेरे इश्क में हूँ-२
मुझे कुछ तो बता
दे अपना पता
दीवाना हूँ मैं तेरा ,तुझे सब है पता
मुझे कुछ तो बता-२
मैं क्या ..............
बातें तेरी क्यों करता हूँ मैं,
रातों को क्यों जगता हूँ मैं,
ये क्या हो गया मुझे, मुझको नही कुछ भी पता
ओ दिलरुबा,मेरी दिल रुबा-२
मैं क्या ...........
मेरे बस में कहाँ, अब मेरा जहाँ
जब से हुआ दिल मेरा तेरा
कोई जादू है, या है कोई नशा
मुझे कुछ तो बता
दे अपना पता
मैं क्या ........
सचिन

तेरा चेहरा......

तेरा चेहरा मूझे, आफ्ताबी लगे
तेरी आँखे मुझे, नुरानी लगे
जुल्फे तेरी घटाओं सी है-2
गोरा, बदन, संगमरमरी सा दिखे
तेरे चेहरा.......
हवाए भी कुछ, नम सी है
पा के, तुमको, जिंदगी दूर गम से लगे
तेरा चेहरा ..........
बाहें तेरी अनोखी लगे
हर चीज तुम में अलग सी दिखे
जादू नही, तो और क्या कहूँ मैं-2
अदाए तेरी जुदा सी दिखे-2
तेरा चेहरा .......
होंटो की लाली, पे क्यों दिल फ़िदा है-2
दोनों आलम की मेरी अब कहानी यही है
तेरा ...........
सचिन

किस्तों में

आश्मां किस्तों में मिल रहा है मुझे-३
जाने क्या बात है,कुछ नया रिश्तों में मिल रहा है मुझे
आश्मां ...........
कुछ नही प्यार है,आप सब का यह
जो मिल रहा है मुझे-२
आपकी दुआए है जिसका है ये असर
जो मिल रहा है मुझे-२
यह शहेर आपको है नज़र
आपके लिए मिली यह नई-नई शहेर
कुछ नया मिल रहा है मुझे-२
अश्मा..............-२
सचिन

अगर कही पे है खुदा तो....

अगर कही पे खुदा तो,मेरी फर्याद सुनेगा
जैसे किया औरों को मुझको भी आबाद करेगा
सुना है अभी, मेरे दिल का जहाँ
है सुना है अभी मेरे दिल का जहाँ
इसमे भी हल-चल करेगा
जैसे किया औरों को मुझको भी आबाद करेगा
अगर कही ...
थोडी देर ही सही,
कुछ बाद में कही
न कही तो होगा,
हेहेहे थोडी देर ही सही कुछ बाद में कही न कही तो होगा
जो मेरा अपना होगा
अगर कही पे खुदा तो सचिन की फर्याद सुनेगा
जैसे किया औरों को मुझको भी आबाद करेगा
सचिन

मेरी खामोश धडकनों को .....

मेरी खामोश धडकनों को
तुम धड़कने की वजह न दो
मेरे सोये हुए अरमानो को
तुम जगने की वजह न दो
जो धड्केगा दिल तो ये कहेगा
की यह चाहता है तुमको
जो ........... अरमान मेरे तो
देखेंगे ख्वाबों में भी तुमको
चाहतें है हम तुमको धड़कन मेरी हर पल कहेगी
चाहे हो जो हर पल मेरे अरमानों ख्वाबों में तुम ही रहोगी
तुम इन धडकनों को,इन ख्वाबों को कोई ऐसी
वजह न दो
मेरी खामोश ........
दिल तोड़ दोगी तुम मेरा कभी
दोगी मायूसी इसको कभी
दिल की हसरत, मेरी खामोश धडकनों
को सोने दो
मेरे खामोश ......
तड़पने से याद में तेरी अच्छा है,खामोश ही रहने दो
ख्वाबों को टूटने से अच्छा इन्हे पलकों में बंद रहने दो
मायूसी मिलने से अच्छा,खामोशी में जीने दो
मेरी खामोश ..........
सचिन

जिंदगी-धुआं

दर्द अपना हम किस-किस से छुपायें
औरों का तो न पता,ख़ुद से कैसे छुपाये
धुआ हो गई है जिंदगी यह हमारी
उड़ गई न जाने कब खुशिया हमारी
दर्द .........
न मिलने का तुमसे हमे गम है
................... का तुमसे,गम है
दर्द है मुझको तेरे दूर चले जाने का
उम्मीद है हमे तेरे लौट आने की
जलते है चिराग मन में,उम्मीदों के
खो गई है रौशनी,पर धुए में
धुआं बन गई जब से जिंदगी, यह हमारी
बात यह हम किस-किस से छुपाये
दर्द............
हर चेहरा लगता है तुम्हारा इन आंखो से
कुछ और देखना नही गवरा इन आंखों से
धुआ हो गई जिंदगी हमारी हम कैसे छुपाये
इस धुए में हम ढूँढने ख़ुद कों कहाँ जाए
छोड़ गए रस्ते में हमे हमसफ़र हमारे
डरा इस बातका हम कैसे ख़ुद से छुपाये
दर्द ,..............
सचिन

हर पल की कसम

इस बिगड़े हुए मौसम की कसम,
मेरे उजड़े हुए चमन की कसम,
हर पल में जो हो तुम
हर उस पल की कसम
तेरी काली जुल्फों की कसम
रात के अंधेरों,दिन के उजाले की कसम
मेरे नाजुक दिल,नादा मन की कसम
छाई है जो घटाए, इन घटाओं की कसम
बरश्ते हुए पानी की कसम,
भूल गई हो जो तुम,
हर उस भूले हुए लम्हों की कसम
साथ जो बिताये थे हमने , हर उस बीते हुए पल की कसम
कैसे कहें कितना चाहते है,
तुमको हम सनम
सचिन

मवास

मंडरा रही है यहाँ,सूखे खेतों पे तितलियाँ
फैली चारों तरफ़ उदाशी और वीरानिया
हर तरफ़ सन्नाटा है, हर तरफ़ खामोशिया
बस और बस है,इन बहारों में ...........
सुख रही है यहाँ धरती,खो रही हरयालिया
ढूँढ रहे बच्चे जिसको, यहाँ नही वो खुशिया
दूर मन्दिर का घंटा,पास शमशान के पट
करहा रही माये देख , बच्चों की अस्थिया
सूखे ओठ, सजल नयन, गालों पे सुर्खियाँ
तपती गर्मी,उदाश गगन , नंगे पाँव सड़को पे है
सुख गया दूध छाती का,जैसे धरती सुख गई
पेट जा पीठ से,और आँखे अंदर कों चिपक गई
बच्चे नग्न फिर रहे, अर्धनगन सी माये है
काया काली हो रही, सुखी घासों तरसती
कुछ समय पहले तक तो थी यहाँ हरयालिया
पड़ी यहाँ न जाने कब छाया किसकी काली
हूँ मैं इंतज़ार में की कब वो दिन-पल आएगा
खुशहाल मौसम छायेगा ,यह सन्नाटा यहाँ जाएगा
सूखे तल भर जायंगे,सब कुछ यहाँ खिल जाएगा
सचिन






Monday, June 16, 2008

इतिहाश

गूँज उठा रक्त रंजित इतिहाश
एक बार फिर से आज
जाने नज़र किसकी लगी,इसे
के रो पड़ा भारत फिर से आज
गूँज .......
जाग उठी जन-मानस के मन में
वही शहीदों की स्मृति
क्या मिली आजादी हमे
पा के खो देने के लिए?
शब्द जाल का ताना-बाना
बून रहे वो फिर से आज
गूँज.....
अब मुखोटा बदल गया है
बोल रहे फिर भी वो आज
गूँज ......
फैला रहे है वो फिर से
........,आतंक,जातिवाद
सत्तालोलुप्ता फिर से आज
गूँज........
कर रहे है बाज़ार तेज़,गरम
फिर से पलटने कों मर्म
खादी छोड़, फैशन पे ला खड़ा किया
हमे उन्होंने फिर से आज
हाथ मिला कर एक बार ...........
पहहने कों ताज
गूँज ........
हम भूल रहे है , शहीदों कों
उन शहीदों की कुर्बनिया
बिध्वाओं की टूटी चूड़ी
माओं की बिलाप्ती छतिया
फिर से सोच रहे हम
क्या हो कल क्या हो आज?
गूँज ..............
सचिन




गोलाम्बर

मैं अनजाने शहर में नया- नया हूँ
बिल्कुल असहाय और,मैं अकेला हूँ
कोई अपना नही,कोई पराया नही
कोई मित्र नही,कोई शत्रु नही
सभी मेरे पास है,सभी मुझसे दूर
कोई अंदर नही,कोई बाहर नही
बस मैं अंदर हूँ, इसके बाहर एक दुनिया नई
बाह्ये फैलाये ,पलके उठाये ,बैठी है नज़रे बिछाए
मेरे लिए उम्मीद लगाये, मगर शायद नही
ये मेरे गुरु,मित्र ,मैं इनका शागिर्द भाई
है खुबिया जितनी,
मेरे अंदर भर दी है उतनी
शरीफों की शराफत, बैमानों की बैमानी
भरदी है इसने मुझमे दीवानों की दीवानगी
सचिन

धर्म और आतंकवाद

पहले कसाई का काम करता था वो, अब बिस्फोट करता है
इन सब से पहले वो लूटता था, औरो कों अलग अन्द्ज़ में
अपना पन जता- जता कर
कार्बन की कोठरी बन गया है घर उसका
धुन्द्ली हो गई है तस्वीर उसकी, उन्ही की नजरो में
जिनकी शे पर करता था वो कृत्य इतने
संलिप्त थे इन कृत्यों में जो उसके
अब सुरक्षा परिषदों का पूर्णगठन करने में जुटे है
सलाखों से फांसी तक एक जुट हो जुटे है
फिर भी सबक नही सीखा बस एक सवाल बन गया
आते है दोस्ती का दामन थामे
मगर बाद में मजबूर करदेते है
लाखों आंसू रोने
रुलाने से पहले कहते है वो
राजनैतिक दलों का मंथन करो
कैसे बचेगी जनता की दौलत,
कहाँ मिलेगा उन्हें न्याय,
फिर एक सवाल छोड़ देते है वही
बढ़ता खर्च इनपे लादो
राजनीती का नाम परिवर्तन कर
साजिश को नई सकल देते है वो
धर्म का सच्चा स्वरूप हमे,
अपना धर्म बेच-खो कर सिखलाते है
फिर आया धरम परिवर्तन का तिश्रा पछ
धर्म परिवर्तन का बुखार चदा कुछ इस कदर
की वो दिमागी बुखार कर गया ग़दर
हिंदुत्वा कों लेकर कौन कितना उग्र होगा,कौन नही
हिंदुत्वा कों ले कर पुब्लिसिटी का पात्र बन, गया वही
प्रदर्शन से पहले उन गुणों के लिए चर्चित हो गया
जिनका असल में वो मालिक ही नही
फिर भी ये कहते है वही
धर्म से श्रेष्ट बंधू नही
धर्म से बढ़ कर धन नही
=================== -२
दूर कही खो गया है,मुखड़ा उसका
अब जो दिखता है, खून से नहाया हुआ
अतीत वर्त्तमान है उसका
जो भविष्य तक रहेगा,उसके बाद भी उसको रोयेगा
उसके सो जाने के बाद भी,किताबों के पन्ने पे जागेगा
जब भी जागेगा दुःख के शिवा किसी कों कुछ नही मिलेगा
उसके भविष्य का चेहरा ही बिगाड़ दिया है
उसके अपने अतीत ने
सचिन











खिलखिलाके

वो हँसती है मुझपे, खिलखिलाके

नही मुझपे नही, मेरी बेबसी पे

लगता नही हूँ, मैं कही से

पर हूँ बेबस मैं अंदर से

एक नज़र मोहब्बत मुझको चहिये,

छलकते पय्माने जाम से

एक पैगाम मुझको चहिये

थर-थाराते लबों की कसम

एक लव मुझको चहिये

इच्छा नही अनंत सागर की

बस एक गहरा सागर मुझको चहिये

डूब जाऊँ मैं जिसमे एक ऐसा गागर चहिये

दूंद्ता हूँ मैं जिसको जाने वो है कहाँ

इस दिल को बस तस्वीर उसकी चहिये

कम्पन भरी वो चंचल काया

जाने कहाँ छुपी हो माया

एक पल भी जो ठहरता नही कही,

तेरा वो साया मुझको चहिये

खिल रहा है कही एक कमल मेरे दिल में

उस कमल की सुगंध मुझको चहिये

मेरी इस बेबसी पे हँसती हुई, तेरी सूरत नही .........

सचिन

वो आये मय खाने .....

वो आये मय खाने पे हमारे
और जाम छुए बिना ही चल दिए
वो आये दर पे हमारे
और हमे चखे बिना ही चल दिए
गम नही इस बात का की वो जाम न छुए
गम है इस बात की,वो बिन चखे ही चल दिए
वो आये ............
उम्मीद के चिराग रोशन है अब भी
आ जाए दर पे हमारे फिर भी
न जाने जलेंगे कब तक हम इस खावाहिश में -२
न जाने छुए कब प्याले को वो हमारे
या फिर एक और बार बिन चखे ही वो चल दे
वो आये ............
सचिन

तस्व्बूर में .....

वो चले आते है, तस्व्बूर में हमारे
वो आते है, चले जाते है , तस्व्बूर से हमारे
वो चले ...........
दिल जलाने के लिए, हमे सताने के लिए
दिल जब चाहा उनका, वो चले आते है
वो चले आते है -३
एक झलक दिखलाते है अपनी,
एक पल में बेरुखी उनकी,
जाने ऐसा कर के वो,
क्या पाते है -२

वो चले आते है -
आते है जब भी वो तस्व्बूर में हमारे
आ के हमको तड़पा जाते है
दिल को, मन को और भी हमारे बैचन वो कर जाते है
वो चले आते है -
जानते है वो दिल धड़कता है, नाम से उनके
मानते है वो दिल मचलता है नाम से उनके
चाहत हमारी है वो , मगर फिर भी तडपा जाते है वो
जाने ऐसा कर के वो क्या पाते है -२
वो चले ............

सचिन

अब मैं ......... ........ न रहा

अब मैं अखबारी कर्मचारी न रहा
कागज कलम से मेरा कोई रिश्ता न रहा
अब मैं ..............
कल परसों तक था जो रिश्ता
कब टूट गया पता ही न चला
अब मैं.........
हर जगहें होड़ लगी है पैसो की
बचा इससे कोई ऐसा न रहा
इस होड़ मैं रुक कर भी चलता मैं रहा ,
रुकता मैं रहा चलता मैं रहा,
रुक- रुक कर चलता मैं रहा
अब मैं ........
जितना चाहा "सचिन" ने पीछे रहना
अब उतना ही आगे बढ़ता मैं रहा
हर कदम पे पीछे रहने की चाह
हर कदम पे आगे मैं रहा
अब मैं .........................
हसरत मेरे दिल की लिखने वाली
अब मेरे दिल में न रही
फिर भी कागज पे कलम घसीटता मैं रहा
लिखता मैं रहा -२
बस सब कुछ यू ही चलता रहा, पर अब
सचिन अखबारी कर्मचारी न रहा
अब मैं............
सचिन

असंतोष की रेखा

वो जो में असंतोष की रेखा जीता है

पंडित है फिर भी लक्ष्मी की पूजा,

औरों से ज्यादा करता है

वो जो .......

सरस्वती से दूर-दूर का है उसका रिश्ता

बस और बस लक्ष्मी का ही उसको उपासक है जाना जाता

वो जो .....

ये झूठा अस्वासन देता है ख़ुद को,की हमसे बड़ा कोई ज्ञानी नही है

लेकिन "सचिन" जानता है की उनमे क्या है,

और क्या नही है

दूसरो को प्रभावित करने को, उनकी जनम पत्री बाचताये

पर अपनी जनम पत्री औरो से बच्वाता ये

दुश्रे की हातों की रेखाओं का ज्ञान है इन्हे

हर परिस्थिति के पत्थरों का धयान है इन्हे

फिर भी थैला लिए दर-दर घुमे जाते है

वो जो असंतोष ................

जहा से इश्वर का स्मरण है करते

वही पे झूट फरेब पले है रखते

न जाने दिन में कितनी बार ये

हरिॐ का उच्चार्रण है करते

सांसारिक मोह से वो बच नही पता

पहले लक्ष्मी की कामना है करता

वो जो असंतोष ..............

सचिन

नोट- ये सिर्फ़ एक लेखक की कल्पना है जिस पर कोई भी विवाद नही किया जा सकता

धन्यबाद

सचिन

माँ भारती के खानों से

लाडला है ये सब का, हरियाली माँ है इसकी
विचार नेक है पर्वत से, करता है रक्षा प्रदेश की
लोकप्रियता के सर्वोच शिखर पे
है हर जन-मानस के मन में
नही चाहिए धन-दौलत, नही अविलाषा ऐश मौज की
लाडला है .......
मिलता सभी से बन अपना
सुनता है फरियाद सबो की
है सब कुछ इसका औरों के लिए
पिता का प्यार,माँ की ममता
नही है इसका अपना कुछ भी
लाडला है ........
राजा है हर मन का,हर मन में छबी 'पवन" की
जन कल्याण की भावना लिए, बर्षों से ........ है लोक तंत्र में
नही बटा है, नही बटेंगा प्यार इसका गैरों में
लाडला है ......
देवो सा है तेज़ सर पे सत्ता की मुरली हातो में
अडिग विश्वास से चलते पाव नही है दोष कोई मन में
हनु का है आशिस इशको, तीस्ता का आँचल इस पर
लाडला है .......
अवतार है बनवासी सा, बस्ती है मन में जनता
राम राज्य सा आलम है, नही किसी को चिंता कोई
प्रगति के पथ पर नित आगे बढ़ना
साधा हुआ लक्ष्य है इसका
लाडला है .......
............. चल नही चलता ये, पवन बेग सा चलता है
बने हर कोई ऐसा, यही कामना हर जन करता है
लाडला है ......
चारों तरफ़ लगे है मेले वन, उपवन, पहरों के
देवो की है कृपा विशेष , इस खिलते चमन नज़ारों पे
खड़ा है हिम सीना ताने, आंधी,तूफानों,बार्शतों में
दूर से रखे नज़र दुश्मन मुल्क जवानों पे
ऐसा ही है ये सपूत एक, माँ भारती के खानों से
लाडला है ......
सचिन

मैंने प्यार किया है

मैंने प्यार किया है, तुमसे मेरी जाना
खुदा की कसम लो, चाहे मुझको आजमा लेना
मैंने प्यार किया है .....-२
पर्बत से भी ज्यादा है,अटल इरादा मेरा
छोडूंगा न कभी, मैं साथ तेरा मेरी जाना
है ये मेरा इरादा -२
मैंने प्यार किया .....-२
इंसा हो, चाहे हो खुदा,
कर सकेगा, न कोई जुदा,
ये ही है मेरे दिल में जाना
मैंने प्यार किया.....-२
अल्फाज़ नही इजहारे है
हम भी सदा तुम से दिल हारे है
चाहे ले लो कोई कसम, कोई वादा मेरी जाना
मैंने प्यार किया ........-२
मेरा जिस्म, मेरी रूह तेरी ही अमानत है
मेरे खयालो में भी आये कोई तो क़यामत है
सुन ले खुदा भी के , मैंने प्यार किया है -२
मैंने प्यार किया है .......-२
सचिन

आपने मेरे गीतों को ....

ये ठीक किया नही आपने, मेरे गीतों को उछाल
दर्दे दिल के जख्मो को उछाल के
वो थे गीत मेरे, वो बोल भी थे मेरे
पर ये बदकिस्मती थी मेरी
की वो हुए न मेरे -२
ये ठीक किया नही....-२
मैं तो समझता था उन्हें अपना
पर वो निकले किसी गैर के
इसमे खता क्या है मेरी
जो वो हुए न मेरे
मैं इतना बुरा तो नही जो चुरालू गीत किसी के
वो थे गीत मेरे, वो थे बोल भी मेरे
ये ठीक ...............-२
सचिन

शशि हो तुम या हो सबा

शशि हो तुम, या हो सबा
इसमे कोई शक नही
कह रहा हूँ,मैं तुमको जो अपना
क्या इसपे भी मेरा, हक नही
ऐसा न हो,हम रह जाए तनहा
यादों में तेरी, हम भूल जाए दुनिया
मुझको लगी जब तुम अपनी सी
मैंने कहा तुम हो अपनी ही
क्या इसपे भी मेरा हक नही-२
प्यार करता हूँ मैं जो तुमको
प्यार पे मेरे तुमको शक है कही
शशि हो तुम ..........
ये शशि मैडम के लिए
सचिन

Sunday, June 15, 2008

शहर समंदर

शहर समंदर खंडहर है
मेरा जहाँ वीराना है
सुखी नदिया बहते आंसू
मेरा यही तराना है
चाहु गाना इसको मैं
पर इसको ही गाना है
श्राप के जैसा जीवन ये इसको जीते जाना है
कुछ भी नही है, सब खाली है
सुना मेरा घराना है
जाऊँ कहाँ, अब समझाऊ किसको
जब अपना मन ही बेगाना है -२
सोचा था क्या जिन्दगी में,
क्या हो गया मैं जिन्दगी में,
चाहत न थी कुछ ज्यादा,
उजर गया सब इसी बंदगी में
सुनता नही है कोई यहाँ,
खुदा तक भी पहुंचे न मेरी फर्याद
अब क्या करू मैं
मेरा जहाँ वीराना है -३
छत पे अकेला, भीर में तनहा
मेले मैं नही मेरा कोई ठिकाना है
मेरा जहा वीराना है -३
शहर समंदर ........
सचिन

Friday, June 13, 2008

बूंदे

देखो बूंदे टपक रही है, मेरी गीली छत से
कैसे बरस रहा है, पानी ये अम्बर से
कपड़े भींगे, तन भींगा, मन भी मेरा भींग गया,
आलम न पूछो इस घड़ी का,
की शमा भी भींग गया,
पलकों से छलके आंसू खुशी के
अधरों पे मुस्कान है थीरकी
याद आई बचपन की गलिया,
जहाँ कभी सपनो की थी नाव चली
माटी के घरोंदे, माटी की सड़के, माटी के थे सभी
वहाँ बरश्ती छत माटी की, यहाँ सीमेंट गारे की
आश्मां आया है आज ख़ुद घर मेरे चल के
अम्बर ये पानी बर्षा रहा है, मेरी छत से
दिन का उजाला, रात की चांदनी
झाक रही झारोंको से
तारे रात के चमक रहे जुगनुओं से
देखो बूंदे .....................
सचिन

वृधा तन में यौवन मन

वृधा तन में यौवन मन, सांसे टूटी जैसा जीवन

वृधा ......

कंधो पे बोझ जैसा जीवन ,

वृधा तन में यौवन मन कंधो पे बोझ,

बचपन की सोच

वो घुटनों पे चलना, हाथो को टेकना
आंखो से,फिर सपनो को देखना

बीते कल को भूल कल की सोचना

मन जख्मी है कल की सोच , आज तन

वृधा .......

वही दौड़ वही भाग
वही जोर वही गुना

जिंदगी का फिर वही दौर
जहा से चला था इस जहाँ के लिए
वही खड़ा हूँ इस जहाँ को लिए
बचपन के साथ यौवन , यौवन के साथ जीवन

जीवन तन मन, रुक गया है सब कुछ

जैसे रुकी हो में सिने में धड़कन
वृधा ..............

सचिन

कसक

कसबिन कसे कसनी को कस से
कसनी में अपनी कसक को कस से
पत छोड़ पतिता बन गई , मनिका से बनी मंथर
पत्तेर बन उर गई वो , मेरे अंदर की मृगाछी
मवास में मर्दन हुआ मेरा
मरल उतरा आंखों का मेरी
पिशुन किया मेरे प्रिय ने, कुपंथ दिया मेरे अपनों ने
द्वीप जो था मेरा उसी ने कर "कर"इस घट को दुख्लाया
कहवा जाए अब कोई मनिका,इस रंन्य में सभी मधंद
मधुक लालसी मंडरा रहे करने को मर्द्धन
ऐसे पिसाच भी यहाँ घूम रहे
बिन पत जो माँ का भी कर दे मर्दन
माँ सु थी कभी यह कसबिन
इसको बाज़ार में लाया किसने?
इसको कसबिन बनाया किसने?
चंद्र बदन चंद्र नयन वीना
हातों में जाम थमाया किसने?
इसको कसबिन बनाया किसने?
नाग सिंघासन हुआ जिसका
वन आँगन हुआ जिसका
हर जन आया इससे
फिर यह इसको लाया किसने?
इसको कसबिन बनाया किसने
सचिन


Thursday, June 12, 2008

सारी दुनिया, सारे बाज़ार

कहाँ था तू अब तक यार
कितना ढूँढा तुझे, सारी दुनिया सारे बाज़ार
कम हो गई रौशनी मेरे आंखों की
बुझ गई लालटेन मेरे दिल की
कहाँ था ......
कहाँ था तू अब तक यार
कितना ढूँढा तुझे घर बार
लोगों से पूछा बार-बार
कोई बता दे तेरा पता एक बार
कहाँ था .........
कहाँ था तू अब तक यार
कितना ढूँढा तुझे सारा संसार
लंदन - ब्रिटेन पेरिस फेरे
आया गया मैं जाने कितनी बार
कहा था ...........
सचिन

Wednesday, June 11, 2008

पट

पट बंद हो जा दिन के की रात के पट खुलने को है
सो जा सूरज तू दिन के की रात का चन्दा जगने को है
दिन का उजाला ढलना है अभी, रात की चांदनी फेलनी है
तपती गर्मी के बदले कुछ शीतल बूंदे मिलने को है
पट बंद ............
भाव बिभोर हो जाना है, कुछ देर के लिए खो जाना है,
उड़ती मिटटी और धुल से, निजात अभी मिलने को है,
पट बंद ..........
तेज़ रौशनी का दिन दला, सुर्मुई सी शाम है आई
छुईमुई सी शाम में, शर्मा के वो बात है आई
जो कह न सके थे दिन के उजाले, वो बात अब होने को है
पट बंद ..........
पुष्प कमल और नवयौवन के मिलन की बेला आई,
मंडराने लगे है भवरे यह हर कलि खिलने को आई,
मंजर ऐसा शाम का श्याम पिया से मधुर मिलन का
अब बस इंतजार नही , अब तो शर्म कहाँ
ओ दिन के उजाले लौट जा तू, घर को अपने वापस जा,
उन्हें भी अब तो आने दे,देर हुई बहुत अब और देर न लगा
पंछी के कलरव से पहले , मुझ प्यासी को मिल जाने दे
पट बंद हो जा विरह के की प्रेम के पट खुलने को है
मन व्याकुल है मिलने को उनसे,की मन उनसे अब मिलने को है
पट बंद ...............
सचिन

रिश्तो का खोया हुआ टुकडा

रिश्तों का खोया हुआ टुकडा हूँ मैं
आपने आप में एक दुखरा हूँ मैं
किसी को कह नही सकता
किसी की सुन नही सकता
कोई सुन ले मुझे, औरों का तकता
मुखरा हूँ मैं
रिश्तों का ..........
बीमार बच्चे सफ़ेद जहर पीते
टुकडों में रहते, टुकडों में जीते
शहर में सर्केश की रौनक है, यहाँ फिर भी विवाद लगा है,
सूद और मूल की रकम है, कितनी यहाँ मसला पड़ा है,
मेले में ज्यादा बिकते बेजान पशु है,भूखमरी एक कलंक
का टुकडा है
रिश्तों का .........
फिर भी भोग और योग में है होती तुलना
कर्र्ता साक्षी मिल कर कहते,असफलता से है जूझना
कुछ अर्से बाद उसी मंच पर, एक दूजे का कच्चा चिट्टा है खोलते
खो जाते है रिश्ते इन्ही दुख्रो में
इन्ही रिश्तों का खोया टुकडा हूँ मैं
रिश्तों का ..........
सचिन

Tuesday, June 10, 2008

आप के लिए

माननीय कवियों, लेखकों, गीतकारों एवं अन्य बुद्धिजीवियों सर्वप्रथम आप सब को आप के सचिन का सादर प्रणाम, मुझे पता नही की मैं कैसे आप जैसा बन सकता हूँ ! पर मुझे उपर वाले ने सिर्फ़ और सिर्फ़ लिखने के लिए ही इस जहाँ को दिया है और मुझे उम्मीद है की मैं इस कसौटी पर खरा उतरूँगा, पर इसका फ़ैसला तो आप को ही करना है, मैं तो बस कोशिश कर रहा हूँ! उम्मीद है आप की कसौटी पर खरा उतरूँ।

मैं आप सब से यह वादा करता हूँ की मैं बहुत जल्द आप की अदालत में अपनी कुछ रचनाये फैसले के लिए भेजूंगा और आप की राय सलाह चाहूँगा।

आप का सचिन