देखो बूंदे टपक रही है, मेरी गीली छत से
कैसे बरस रहा है, पानी ये अम्बर से
कपड़े भींगे, तन भींगा, मन भी मेरा भींग गया,
आलम न पूछो इस घड़ी का,
की शमा भी भींग गया,
पलकों से छलके आंसू खुशी के
अधरों पे मुस्कान है थीरकी
याद आई बचपन की गलिया,
जहाँ कभी सपनो की थी नाव चली
माटी के घरोंदे, माटी की सड़के, माटी के थे सभी
वहाँ बरश्ती छत माटी की, यहाँ सीमेंट गारे की
आश्मां आया है आज ख़ुद घर मेरे चल के
अम्बर ये पानी बर्षा रहा है, मेरी छत से
दिन का उजाला, रात की चांदनी
झाक रही झारोंको से
तारे रात के चमक रहे जुगनुओं से
देखो बूंदे .....................
सचिन
Friday, June 13, 2008
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment