Sunday, June 15, 2008

शहर समंदर

शहर समंदर खंडहर है
मेरा जहाँ वीराना है
सुखी नदिया बहते आंसू
मेरा यही तराना है
चाहु गाना इसको मैं
पर इसको ही गाना है
श्राप के जैसा जीवन ये इसको जीते जाना है
कुछ भी नही है, सब खाली है
सुना मेरा घराना है
जाऊँ कहाँ, अब समझाऊ किसको
जब अपना मन ही बेगाना है -२
सोचा था क्या जिन्दगी में,
क्या हो गया मैं जिन्दगी में,
चाहत न थी कुछ ज्यादा,
उजर गया सब इसी बंदगी में
सुनता नही है कोई यहाँ,
खुदा तक भी पहुंचे न मेरी फर्याद
अब क्या करू मैं
मेरा जहाँ वीराना है -३
छत पे अकेला, भीर में तनहा
मेले मैं नही मेरा कोई ठिकाना है
मेरा जहा वीराना है -३
शहर समंदर ........
सचिन

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