Friday, March 5, 2010

आदमी!

आदमखोर क्यूँ हो गये, हम फिर से आदमी!
आदमयुग में जाने लगे, हम फिर से क्यूँ आदमी!
योजनाए जागरूकता की परोपकारो की
भूलने लगे, हम क्यूँ आदमी!
कही कहावतों कों छोड़,
चलने लगे, हम क्यूँ आदमी!
वेद-पुराणों कों डायन,
कहने लगे, हम क्यूँ आदमी!
ये मैला मन, ये नंगा नाच
करने लगे, हम क्यूँ आदमी!
अंध विश्वासों के सहारे, आंसुओ में
डूबने लगे, हम क्यूँ आदमी!
करतूते इतनी घिनावनी,
करने लगे, हम क्यूँ आदमी!
अपने अहम् कों ऊपर कर
जीने लगे, हम क्यूँ आदमी!
राज्यों,प्रान्तों, में शर्मसार
होने लगे, हम क्यूँ आदमी! 

"ब्लैकहोल!"

दीखता है यहाँ सब, पर एक रंग में
पूरा भी है यहाँ सब, पर एक रंग में
कहने कों सब काला कहते
हर ज़िन्दगी हुई है कैद इस रंग में
अब भी है. आगे भी हो होंगी
जाएँगी सब इस छेद में
समझा कोई,
कोई समझा नहीं
बस उलझता ही चला गया
हर कोई.
इस "ब्लैकहोल!"में
जल्द आ रहा है ये  "ब्लैकहोल!"आपकी कहानी ले कर.