Monday, June 16, 2008

इतिहाश

गूँज उठा रक्त रंजित इतिहाश
एक बार फिर से आज
जाने नज़र किसकी लगी,इसे
के रो पड़ा भारत फिर से आज
गूँज .......
जाग उठी जन-मानस के मन में
वही शहीदों की स्मृति
क्या मिली आजादी हमे
पा के खो देने के लिए?
शब्द जाल का ताना-बाना
बून रहे वो फिर से आज
गूँज.....
अब मुखोटा बदल गया है
बोल रहे फिर भी वो आज
गूँज ......
फैला रहे है वो फिर से
........,आतंक,जातिवाद
सत्तालोलुप्ता फिर से आज
गूँज........
कर रहे है बाज़ार तेज़,गरम
फिर से पलटने कों मर्म
खादी छोड़, फैशन पे ला खड़ा किया
हमे उन्होंने फिर से आज
हाथ मिला कर एक बार ...........
पहहने कों ताज
गूँज ........
हम भूल रहे है , शहीदों कों
उन शहीदों की कुर्बनिया
बिध्वाओं की टूटी चूड़ी
माओं की बिलाप्ती छतिया
फिर से सोच रहे हम
क्या हो कल क्या हो आज?
गूँज ..............
सचिन




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