Tuesday, June 17, 2008

मवास

मंडरा रही है यहाँ,सूखे खेतों पे तितलियाँ
फैली चारों तरफ़ उदाशी और वीरानिया
हर तरफ़ सन्नाटा है, हर तरफ़ खामोशिया
बस और बस है,इन बहारों में ...........
सुख रही है यहाँ धरती,खो रही हरयालिया
ढूँढ रहे बच्चे जिसको, यहाँ नही वो खुशिया
दूर मन्दिर का घंटा,पास शमशान के पट
करहा रही माये देख , बच्चों की अस्थिया
सूखे ओठ, सजल नयन, गालों पे सुर्खियाँ
तपती गर्मी,उदाश गगन , नंगे पाँव सड़को पे है
सुख गया दूध छाती का,जैसे धरती सुख गई
पेट जा पीठ से,और आँखे अंदर कों चिपक गई
बच्चे नग्न फिर रहे, अर्धनगन सी माये है
काया काली हो रही, सुखी घासों तरसती
कुछ समय पहले तक तो थी यहाँ हरयालिया
पड़ी यहाँ न जाने कब छाया किसकी काली
हूँ मैं इंतज़ार में की कब वो दिन-पल आएगा
खुशहाल मौसम छायेगा ,यह सन्नाटा यहाँ जाएगा
सूखे तल भर जायंगे,सब कुछ यहाँ खिल जाएगा
सचिन






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