Wednesday, June 11, 2008

पट

पट बंद हो जा दिन के की रात के पट खुलने को है
सो जा सूरज तू दिन के की रात का चन्दा जगने को है
दिन का उजाला ढलना है अभी, रात की चांदनी फेलनी है
तपती गर्मी के बदले कुछ शीतल बूंदे मिलने को है
पट बंद ............
भाव बिभोर हो जाना है, कुछ देर के लिए खो जाना है,
उड़ती मिटटी और धुल से, निजात अभी मिलने को है,
पट बंद ..........
तेज़ रौशनी का दिन दला, सुर्मुई सी शाम है आई
छुईमुई सी शाम में, शर्मा के वो बात है आई
जो कह न सके थे दिन के उजाले, वो बात अब होने को है
पट बंद ..........
पुष्प कमल और नवयौवन के मिलन की बेला आई,
मंडराने लगे है भवरे यह हर कलि खिलने को आई,
मंजर ऐसा शाम का श्याम पिया से मधुर मिलन का
अब बस इंतजार नही , अब तो शर्म कहाँ
ओ दिन के उजाले लौट जा तू, घर को अपने वापस जा,
उन्हें भी अब तो आने दे,देर हुई बहुत अब और देर न लगा
पंछी के कलरव से पहले , मुझ प्यासी को मिल जाने दे
पट बंद हो जा विरह के की प्रेम के पट खुलने को है
मन व्याकुल है मिलने को उनसे,की मन उनसे अब मिलने को है
पट बंद ...............
सचिन

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