Monday, June 16, 2008

धर्म और आतंकवाद

पहले कसाई का काम करता था वो, अब बिस्फोट करता है
इन सब से पहले वो लूटता था, औरो कों अलग अन्द्ज़ में
अपना पन जता- जता कर
कार्बन की कोठरी बन गया है घर उसका
धुन्द्ली हो गई है तस्वीर उसकी, उन्ही की नजरो में
जिनकी शे पर करता था वो कृत्य इतने
संलिप्त थे इन कृत्यों में जो उसके
अब सुरक्षा परिषदों का पूर्णगठन करने में जुटे है
सलाखों से फांसी तक एक जुट हो जुटे है
फिर भी सबक नही सीखा बस एक सवाल बन गया
आते है दोस्ती का दामन थामे
मगर बाद में मजबूर करदेते है
लाखों आंसू रोने
रुलाने से पहले कहते है वो
राजनैतिक दलों का मंथन करो
कैसे बचेगी जनता की दौलत,
कहाँ मिलेगा उन्हें न्याय,
फिर एक सवाल छोड़ देते है वही
बढ़ता खर्च इनपे लादो
राजनीती का नाम परिवर्तन कर
साजिश को नई सकल देते है वो
धर्म का सच्चा स्वरूप हमे,
अपना धर्म बेच-खो कर सिखलाते है
फिर आया धरम परिवर्तन का तिश्रा पछ
धर्म परिवर्तन का बुखार चदा कुछ इस कदर
की वो दिमागी बुखार कर गया ग़दर
हिंदुत्वा कों लेकर कौन कितना उग्र होगा,कौन नही
हिंदुत्वा कों ले कर पुब्लिसिटी का पात्र बन, गया वही
प्रदर्शन से पहले उन गुणों के लिए चर्चित हो गया
जिनका असल में वो मालिक ही नही
फिर भी ये कहते है वही
धर्म से श्रेष्ट बंधू नही
धर्म से बढ़ कर धन नही
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दूर कही खो गया है,मुखड़ा उसका
अब जो दिखता है, खून से नहाया हुआ
अतीत वर्त्तमान है उसका
जो भविष्य तक रहेगा,उसके बाद भी उसको रोयेगा
उसके सो जाने के बाद भी,किताबों के पन्ने पे जागेगा
जब भी जागेगा दुःख के शिवा किसी कों कुछ नही मिलेगा
उसके भविष्य का चेहरा ही बिगाड़ दिया है
उसके अपने अतीत ने
सचिन











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