मैं अनजाने शहर में नया- नया हूँ
बिल्कुल असहाय और,मैं अकेला हूँ
कोई अपना नही,कोई पराया नही
कोई मित्र नही,कोई शत्रु नही
सभी मेरे पास है,सभी मुझसे दूर
कोई अंदर नही,कोई बाहर नही
बस मैं अंदर हूँ, इसके बाहर एक दुनिया नई
बाह्ये फैलाये ,पलके उठाये ,बैठी है नज़रे बिछाए
मेरे लिए उम्मीद लगाये, मगर शायद नही
ये मेरे गुरु,मित्र ,मैं इनका शागिर्द भाई
है खुबिया जितनी,
मेरे अंदर भर दी है उतनी
शरीफों की शराफत, बैमानों की बैमानी
भरदी है इसने मुझमे दीवानों की दीवानगी
सचिन
Monday, June 16, 2008
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