Monday, June 16, 2008

अब मैं ......... ........ न रहा

अब मैं अखबारी कर्मचारी न रहा
कागज कलम से मेरा कोई रिश्ता न रहा
अब मैं ..............
कल परसों तक था जो रिश्ता
कब टूट गया पता ही न चला
अब मैं.........
हर जगहें होड़ लगी है पैसो की
बचा इससे कोई ऐसा न रहा
इस होड़ मैं रुक कर भी चलता मैं रहा ,
रुकता मैं रहा चलता मैं रहा,
रुक- रुक कर चलता मैं रहा
अब मैं ........
जितना चाहा "सचिन" ने पीछे रहना
अब उतना ही आगे बढ़ता मैं रहा
हर कदम पे पीछे रहने की चाह
हर कदम पे आगे मैं रहा
अब मैं .........................
हसरत मेरे दिल की लिखने वाली
अब मेरे दिल में न रही
फिर भी कागज पे कलम घसीटता मैं रहा
लिखता मैं रहा -२
बस सब कुछ यू ही चलता रहा, पर अब
सचिन अखबारी कर्मचारी न रहा
अब मैं............
सचिन

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