Wednesday, April 7, 2021

दुनिया

काश के बदल जाती मेरे शब्दों से दुनिया
बड़ी खूबसूरती से सहेज लेता मैं दुनिया
खा लेता चांद समझ रोटी मैं तुझे
गर मां थाली में पड़ोस देती न दुनिया
तमाशे बड़े देखता हूं जहां में
नजारें भी गजब दिखती है दुनिया
हरारतें अपनी मिटा लेने के बाद
नामुराद समझ लेती है दुनिया
नाराज गर हो जाए सब अपने
तो दिलशाद हो जाती है दुनियां
काश के बदल जाती मेरे शब्दों से दुनियां
बड़ी खूबसूरती से सहेज लेता मैं दुनियां

Tuesday, May 22, 2012

इंतज़ार में नुक्स है 
इंतज़ार में नुक्स है,
इल्म इसका किसको है,
लुफ्त ए इंतज़ार का मज़ा बन  गई 
अजीब सी सजा धड़कने चाहत की 
इंतज़ार ए धड़कन हो गई 
और एक  तुम  हो की ..........हा.

बदल  गए हो तुम  जब  से, जुदा हुए हो तुम,
न  जाने क्यू ये नाराज़गी  है, किस  बात  का गुमां  है 
खबर नहीं तुम्हे के कोई प्यार में तेरे कितना दर दर घुमा है,
खामोश  हो तुम पर इधर अजीब सी हलचल  है 
क्यू  कोई इबादत  करे 
कोई क्यू  तुमको पूजे 
नीम  सजदे में क्यू  कोई झुके 
कैसे चले कोई इन  राहो पे,
जिस पे हर  पग  पत्थर  दिल  सनम  मिले 
उफ़  कितनी विसम्ताओ  से भरा है ये जीवन 
उस  पर दुविदा जीने की 
क्या जुल्म है ये 
क्या सितम है ये 

Friday, April 15, 2011

अ ब्लैकहोल

हर इंसान की जिंदगी में, जिंदगी के बाद और मौत के ठीक पहले आता है ये "ब्लैकहोल" जिसमे हर इंसान को जाना ही होता है।

Friday, March 5, 2010

आदमी!

आदमखोर क्यूँ हो गये, हम फिर से आदमी!
आदमयुग में जाने लगे, हम फिर से क्यूँ आदमी!
योजनाए जागरूकता की परोपकारो की
भूलने लगे, हम क्यूँ आदमी!
कही कहावतों कों छोड़,
चलने लगे, हम क्यूँ आदमी!
वेद-पुराणों कों डायन,
कहने लगे, हम क्यूँ आदमी!
ये मैला मन, ये नंगा नाच
करने लगे, हम क्यूँ आदमी!
अंध विश्वासों के सहारे, आंसुओ में
डूबने लगे, हम क्यूँ आदमी!
करतूते इतनी घिनावनी,
करने लगे, हम क्यूँ आदमी!
अपने अहम् कों ऊपर कर
जीने लगे, हम क्यूँ आदमी!
राज्यों,प्रान्तों, में शर्मसार
होने लगे, हम क्यूँ आदमी! 

"ब्लैकहोल!"

दीखता है यहाँ सब, पर एक रंग में
पूरा भी है यहाँ सब, पर एक रंग में
कहने कों सब काला कहते
हर ज़िन्दगी हुई है कैद इस रंग में
अब भी है. आगे भी हो होंगी
जाएँगी सब इस छेद में
समझा कोई,
कोई समझा नहीं
बस उलझता ही चला गया
हर कोई.
इस "ब्लैकहोल!"में
जल्द आ रहा है ये  "ब्लैकहोल!"आपकी कहानी ले कर.

Monday, January 25, 2010

सरताज/

भेज रहा हूँ अल्फाज अपने आपके दरबारे हुजुर
मिल जाये नजरे इनायत " नवी" आपके गुलाम कों
मैं अकेला नहीं जी रहा हूँ,दोजक से इस जहाँ कों
बना दो पल में हीरा तुम,मिट्टी के इन्शान कों
यु ही सब कहते नहीं है, जहाँ के हो "खुदाया" तुम
मुल्के अरब में रहते हो। बसते हो हर मन में तुम
दिल के,मन की, चिलमन की क्या
सुन लेते हो ख़ामोशी कों भी तुम
तुम बिन सब अधुरा सा है
कर दो जहाँ मुक्कमल तुम
आने से पहले क़यामत,होने से पहले ये दुनिया जहनुम
दोजक की आग है "अल्लाह"
बन्दों की फरयाद कों "मौला"
करो न ऐसे नजरे अंदाज तुम
उम्मीद की अर्ज है तुमसे,करदो चिरागे रोशन तुम
नादा हूँ मैं,नादा है मन
दौलत हो इस तन की तुम
नापाक नहीं इरादे मेरे सरताज हो तुम

मैं क्यूँ नज़र होऊं मैं कोई पैगम्बर तो नहीं
यु न सलीब पे चदाओ मुझे या कोई सलीका तो नहीं
माटी हूँ मैं बस खुदाया न बनाओ
चोखट पे रखो अपने मुझे न घर में जाओ
नहीं लायक मैं किसी-किसी लायक तो बनाओ
सांचे में ढालो आग में तपाओ
नहीं लायक मैं किसी-किसी लायक तो बनाओ
हो सके तो मुझे इन्शान बनाओ
परखी नज़रों की है जरुरत, वो नज़र तो लाओ
पल में बना दे जो मिटटी कों हिरा
वो तराशा हुआ सामान तो लाओ
हूँ मैं दबा गम के टेल,
कोई शाकी,पैयामाना, ख़ुशी का पैगाम तो लाओ
बोझल इन हसी फिजाओं में एक हसीं शाम तो लाओ
शदीयों की है शर्दिया यहाँ
कुछ गर्मिया ले आओ
मिल जाऊ अब मं मिटटी में
कोई ऐसी नमी तो ले आओ
मुझे पैगम्बर न बनाओ
मुझे पैगम्बर न बनाओ
 
शहरे नबी में बस जाऊ मैं
शाहे अरब की नज़र पाऊ मैं
मौला मेरे इतना तो कर दो
बन्दे पे अपने करम तो करदो
खड़ा हु बाहर मदीने के कब से
दूर हूँ फिर समंदर के जिसे
मुक्कमल जहा ने किया नज़रअंदाज़
अपना बना लो आका मेरे मुझको आज
अपने करम से नवाजो तुम सब कों
ठीक नहीं तुम भुलादो  जो मुझको
जब से जहा में हम मैं,मैंने कुछ भी न पाया
चाह है तहे दिल से तुमको, तुम ही हो मेरे खुदाया
न आंसू  बहता, न मैं मजबूर हूँ
दर पे तेरे बस मैं कमजोर  हूँ
भर दो दम मुझपे बस इतना करम
बी रुखसत हो तेरे शहर से जाऊ कहा
सब कों छोड़ आया हूँ जब मैं यहाँ
 
 
 
इस संघर्ष भरी ज़िन्दगी कों कुछ बेहतरी से जी तो लू
याद करे कोई रुखसती से पहले कुछ ऐसा कर तो लू
अभिलाषा नहीं है और कोई
चंद खुशियों से कुछ दमन तो भर दू 
अशांत से इस माहोल में थोड़ी सरगमे घोल दू
थका हुआ हर कोई है, चंद लम्हों की रहत तो दू
इस संघर्ष...............
 
 
 
 

Saturday, September 5, 2009

मेरी राधा वापस करो कन्हैया

कुछ ऐसा कर दो कन्हैया,दुनिया मेरी बदल दो कन्हैया
सुन लो मेरी ओ बंशी बजैया
कुछ ऐसा ......
मेरी राधा हुई तेरी दीवानी,तेरा बन्ने की उश्ने है ठानी
बैठे-बिठाये क्या किया,तुझको कमी क्या गोपियाँ की
ओ नटखटिया
कुछ ऐसा .....
क्या जादू क्या मंतर मारा
अपनी मुरलिया का किया क्या इशारा
मेरी राधा तुने छीनी वापस दे-दे, ओ रास-रचैया
कुछ ऐसा ....
मथुरा की गलियां,गोकुल की गोपी
तेरे बिन सब है सुनी पड़ी
आजा-सजा-जा ओ कृष्ण कन्हैया
कुछ ऐसा........
सचीन निरंजन केजरीवाल

Sunday, August 23, 2009

तुमसे सीखे / भूल जाते हो

आ के न आना कोई तुमसे सीखे
दिल को चुराना कोई तुमसे सीखे
नजरे मिलाना और न न कहना
हँसते-मुस्कराते दिल को चुराना
कसमों को देना,वादों को लेना
दिल चाहे जब फिर तोर देना
ऐसी आदयें कोई तुमसे सीखे
आ के न आना कोई तुमसे सीखे
तुमको पता है हम मरते है तुमपे
दिलों जान से प्यार करते है तुमसे
अकरते हो तुम,चलते हो तन के
ऐसी अदाए कोई तुमसे सीखे
आ के न --------
बनते हो सीधे,दीखते हो भोले
जालिम बड़े हो तुम कातिल ओ मेरे
नजरे मिलाना और न न कहना
दिल को चुराना कोई तुमसे सीखे
आ के न ------

नम.२
अरे जाते हो तुम जो चले जाते हो
आने के रस्ते सरे भूल जाते हो
हाँ जाते हो तुम जो---------
रूठ जाते हो जब तुम मानते नही
लगता है ऐसे हमको जानते नही
ये ठीक नही है जान लो,
कहना मेरा देखो तुम मान लो
मुझको जरा पहचान लो
क्यों जलाते हो दिल को दिलबर मेरे
मान जाते नही क्यों सितमगर मेरे
अरे जाते हो ------

सचीन निरंजन केजरीवाल

भगवन

मैंने तुमको देखा है,मेरे भोले भगवन

मिलने मुझसे आते हो ख्वाबों में तुम हरदम

तुम अच्छे हो,तुम सच्चे हो

तुमसे है ये जीवन

मुझको बनाया है तुमने,और बनाया जमी ये गगन

मैंने तुमको-----

दिल में हो तुम बसे हुए,मन में हो तुम सजे हुए

हर जगह हो तुमको ही, तुम हो बस हर जगह
मेरे भोले भगवन

मैंने तुमको -----
कभी-कभी तुम रूठ जाते हो मुझसे

अभी भी तो तुम रूठे हो मुझसे, मान भी जाओ,अब जिद छोड़ो -२

मेरे प्यारे भगवन

मैंने तुमको---

दुःख में और चिंता में साथ रहो तुम हरदम

इतनी कृपा करो हमपे रहे हर तरफ़ खुशियो का मौसम

मैंने तुमको देखा है .........
सचीन निरंजन केजरीवाल---

मुझे कुछ न चाहिए------

मुझे कुछ न चाहिए इससे ज्यादा
एक तेरा प्यार हो संग मेरे सदा
तनहा रहू मैं न कभी
प्यार से ये तेरा वादा
मुझे कुछ न ----
चाहे हो शहर,चाहे समंदर
चाहे वो महल हो,चाहे खंडर
धरती पे रहू,चाहे रहू अम्बर पर
मुझपे रहे सदा तेरा असर
मुझे कुछ न---
मैं हूँ सदा तेरा ही जाना
जाने से पहले तुम चली आना
भूल जाऊँ मैं तुझको,उससे पहले तुम याद आना
जीवन भर साथ रहना,सुन लो जाना तुम मेरा कहना
मुझे कुछ न ----
सचीन निरंजन केजरीवाल

Thursday, August 20, 2009

क्यों पूजे हम तुमको ?

क्यों पूजे हम तुमको, क्यों माने भगवान्
दिया है क्या तुमने हमको बना दिया शैतान
क्यों पूजे ----
आज नही, कल का नही कभी का नही है रिश्ता अपना
हो कहाँ तुम मुझको दिख जाओ भगवान
क्यों पूजे----
नही हो तुम मेरे अपने, पुरे किए नही कोई सपने
फ़िर हो कैसे तुम भगवान
क्यों पूजे -----
दुःख दिया है, दर्द दिया है
कर दिया जीवन को शमशान
तख्लिफों में जीते है हम, तुम कैसे हो भगवान
क्यों पूजे---
पत्थर हो तुम,माटी हो नही है तुम में जान
क्यों पूजे----
इस दिल को तुने जला दिया
सब कुछ तुने खाक किया
अब रहा नही मैं इन्सान
क्यों पूजे ----

सचीन निरंजन केजरीवाल

हवा

जिधर बही हवा बह गए हम
दिल ने कहा जिधर निकल गए हम 
सडको की धुल से हो के रह गए हम 
बारिश का पानी बन बह गए हम 
जिधर बही ----- 
दिल ने ------ 
जो खिली धुप गगन में तो जल गए हम 
बिखरी धरा पे चांदनी तो बिखर गए हम 
हर हवा के झोकों संग हो गए हम 
दिल ने ----- 
दिवाली की रात में जल गए हम 
दिये से बन के रह गए हम 
जो आई होली तो भींग गए हम 
काले-पीले रंगों में खो गए हम 
प्यार का रंग जो न मिला जीवन में 
बाकी रंगों में तो घुल गए हम 
दुःख ही सही,तकलीफ ही सही 
दर्द,चोट,ठोकर ही सही हर चीज को सह गए हम 
दिल ने------