भेज रहा हूँ अल्फाज अपने आपके दरबारे हुजुर
मिल जाये नजरे इनायत " नवी" आपके गुलाम कों
मैं अकेला नहीं जी रहा हूँ,दोजक से इस जहाँ कों
बना दो पल में हीरा तुम,मिट्टी के इन्शान कों
यु ही सब कहते नहीं है, जहाँ के हो "खुदाया" तुम
मुल्के अरब में रहते हो। बसते हो हर मन में तुम
दिल के,मन की, चिलमन की क्या
सुन लेते हो ख़ामोशी कों भी तुम
तुम बिन सब अधुरा सा है
कर दो जहाँ मुक्कमल तुम
आने से पहले क़यामत,होने से पहले ये दुनिया जहनुम
दोजक की आग है "अल्लाह"
बन्दों की फरयाद कों "मौला"
करो न ऐसे नजरे अंदाज तुम
उम्मीद की अर्ज है तुमसे,करदो चिरागे रोशन तुम
नादा हूँ मैं,नादा है मन
दौलत हो इस तन की तुम
नापाक नहीं इरादे मेरे सरताज हो तुम
मैं क्यूँ नज़र होऊं मैं कोई पैगम्बर तो नहीं
यु न सलीब पे चदाओ मुझे या कोई सलीका तो नहीं
माटी हूँ मैं बस खुदाया न बनाओ
चोखट पे रखो अपने मुझे न घर में जाओ
नहीं लायक मैं किसी-किसी लायक तो बनाओ
सांचे में ढालो आग में तपाओ
नहीं लायक मैं किसी-किसी लायक तो बनाओ
हो सके तो मुझे इन्शान बनाओ
परखी नज़रों की है जरुरत, वो नज़र तो लाओ
पल में बना दे जो मिटटी कों हिरा
वो तराशा हुआ सामान तो लाओ
हूँ मैं दबा गम के टेल,
कोई शाकी,पैयामाना, ख़ुशी का पैगाम तो लाओ
बोझल इन हसी फिजाओं में एक हसीं शाम तो लाओ
शदीयों की है शर्दिया यहाँ
कुछ गर्मिया ले आओ
मिल जाऊ अब मं मिटटी में
कोई ऐसी नमी तो ले आओ
मुझे पैगम्बर न बनाओ
मुझे पैगम्बर न बनाओ
शहरे नबी में बस जाऊ मैं
शाहे अरब की नज़र पाऊ मैं
मौला मेरे इतना तो कर दो
बन्दे पे अपने करम तो करदो
खड़ा हु बाहर मदीने के कब से
दूर हूँ फिर समंदर के जिसे
मुक्कमल जहा ने किया नज़रअंदाज़
अपना बना लो आका मेरे मुझको आज
अपने करम से नवाजो तुम सब कों
ठीक नहीं तुम भुलादो जो मुझको
जब से जहा में हम मैं,मैंने कुछ भी न पाया
चाह है तहे दिल से तुमको, तुम ही हो मेरे खुदाया
न आंसू बहता, न मैं मजबूर हूँ
दर पे तेरे बस मैं कमजोर हूँ
भर दो दम मुझपे बस इतना करम
बी रुखसत हो तेरे शहर से जाऊ कहा
सब कों छोड़ आया हूँ जब मैं यहाँ
इस संघर्ष भरी ज़िन्दगी कों कुछ बेहतरी से जी तो लू
याद करे कोई रुखसती से पहले कुछ ऐसा कर तो लू
अभिलाषा नहीं है और कोई
चंद खुशियों से कुछ दमन तो भर दू
अशांत से इस माहोल में थोड़ी सरगमे घोल दू
थका हुआ हर कोई है, चंद लम्हों की रहत तो दू
इस संघर्ष...............