किसी घूसखोर ने कहा
मैं कवि हूं
मैंने उससे पूछा
मैं कब का कवि हूं
मैं कवि हूं
मैंने उससे पूछा
मैं कब का कवि हूं
मैं तो छलिया हूं
जिसे सब छल जाते हैं
ऐसा धोखेबाज हूं
जिसे सब धोखा दे जाते हैं
ना-के लायक हूं, सभी इस
नालायक को त्याग कर
दुखों के भंवर में छोड़
जाते हैं
ये दुखता तन
दुखी मन, अब
कौन खरीदेगा
उफ!
कितनी विषमताओं से भरा है,
ये जीवन
उस पर दुविधा जीने की
क्या जुल्म है ये
क्या शितम है ये
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