Thursday, August 20, 2009

बिद्या की देवी

हम कैसे छोड़ दे सरस्वती को, 
जो कम-से-कम तो मेरी है 
लक्ष्मी का है क्या भरोसा, 
आज तेरी कल मेरी है 
हम कैसे------ 
कृपावान है मुझपे ये बिद्या की देवी 
कैसे किनारा कर ले हम, ये जो मेरी है 
हम कैसे छोड़ ------ 
हूँ मैं गंवार अनपढ़ सा 
फ़िर भी मुझपे दयावान है 
ये सरस्वती तो मेरी है 
हम कैसे छोड़------ 
लक्ष्मी है चंचल रूकती नही है 
आज इधर तो कल उधर रहती है 
सरस्वती तो संग सदा मेरे ही चलती है 
फ़िर छोड़ दूं मैं कैसे नाता तोड़ दूं मैंं कैसे 
सब कहते हैं छोड़ दो अपनी कलम को तोड़ दो 
कहाँ जाऊंगा कर मैं ये, 
घट सरस्वती का दुख्ला के 
माफ़ न कर पायेगी मुझको, 
ये सरस्वती जो मेरी है 
हम कैसे --------