धर्म निभाते मानवता का
कितनों की बलि चढ़ गई
कितनों की बलि चढ़ गई
जाने कितनी मांओं ने जोहर किया
आबरू कितनों की ही लूट गई
अहिंसा धर्म नही कायरता है
माधव ये सिखलाते हैं
इंसानियत की आड़ में
गीता हाथ से छुट गई
दिल दुखे न फिक्र में इसके
रोज चिताएं सजती हैं
मानवता की आड़ में देखो
कैसे मानवता ही मरती है
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