अक्षत हूँ मैं क्षत कभी होता नहीं
मैं धरा हूँ,मैं गगन हूँ
भूतल में भी मैं ही हूँ
ब्रह्म मैं हूँ, बिष्णु मैं हूँ
हर जन का स्वामी हूँ मैं
टिके नही सामने दुश्मन कोई
करे जो क्षत मुझे ऐसा नही कोई
कृष्ण मुझमे, राम मैं हूँ
हां हां मैं अक्षत हूँ
रवि है मुझमे, शनि है
मुझमे हर एक का स्वरुप हूँ
विपदा में मैं साथी हूँ,
संघर्ष में विकराल हूँ
मान्यवर हूँ न नश्वर हूँ
क्यों की मैं अक्षत हूँ
मैं अग्नि हूँ,मैं हवा हूँ
मैं ही तो समंदर हूँ
चल हूँ मैं,अचल हूँ मैं
कण-कण और पल-पल हूँ मैं
द्वार मैं हूँ,भीत मैं हूँ
हर जन का मीत हूँ मैं
सुख है मुझमे, दुःख है मुझमे
भवसागर तो मैं ही हूँ
हां हां मैं अक्षत हूँ
पार्थ मैं हूँ, बंधू मैं हूँ
हर लेख और निबंध मैं हूँ
ज्ञान हूँ अज्ञान हूँ,
ज्योति मुझमे,ज्वाला मुझमे
शीत की लहर हूँ मैं
साम, दाम, दंड, भेद, हूँ मैं
हां हां मैं अक्षत हूँ
मोक्ष मैं हूँ,काम मैं हूँ
मृत्यु और आकाल मैं हूँ
शुभ हूँ मैं अशुभ हूँ मैं
हर युग का आगाज मैं हूं
सिखा है मुझमे, दिशा है मुझमे
सुख दुःख का भंडार हूँ
हां हां मैं अक्षत हूँ