Monday, January 8, 2024

आज़ाब

आज कल में उतरेगा वो, शैतान आज़ाब लिए

फरिस्ते की शक्ल में, रहता है जो आसमां में

दुनिया में



कर कुछ ऐसा रहा हूं, आज कल
या तो, मेरी दुनिया में तुम न होगी
या फिर, इस दुनिया में हम न होंगे

सफ़्फ़ाक लोग

बड़े सफ्फाक हैं लोग जालिम
गला रेत कर दुआएं मांगते हैं
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Nerender Singh, प्रसेनजीत कुमार सनातनी and 2 others

वाशिंदे

डूबते सूरज की जानिब
जा रहा है शहर तुम्हारा
वाशिंदे हो अँधेरे के तुम, अब
अँधेरों में करना पड़ेगा गुजारा

Sunday, May 2, 2021

किसान

 मैं वो किसान हूं जो
विचारों के बीज बोता है
और शब्दों की फसल काटता है
मेहनताने में मिलती है मुझे
चंद कहानियां और कुछ कविताएं
और जब कभी सुखा पड़ता है तो
मैं इन्ही कहानियों और कविताओं से

अपना काम चलाता हूं

Friday, April 9, 2021

कबीले वाले लोग

हां वो एक कबीला है
बेढंग से लोग रहते हैं
जो सिर्फ गुनहगार हैं
हो सकता है कुछ अच्छे भी हों
जिनके होने पर भी शक है
याद है कुछ सालों पहले
कितने कबीले वालों ने
कितनी तबाही मचाई थी
ये पागल घोड़े से हैं बस
लगाम कस लो इनकी
ज़रा नरमदिली से पेश आओ
फिर देखो कैसे ये
तुम्हारे घर तुम्हारे शहर
तबाह करते दिखेंगे
सख्त रहो डटे रहो
रहस्य कुछ नहीं है इन कबीलों में
सब के सब बे पर्दा हैं
दुनियां जानती है
सब जानते हैं
ये दुर्दांत दरिंदे हैं
हत्यारे हैं लुटेरे हैं
बस यही एक बात है इनमें
जिससे सब खौफ में हैं

Wednesday, April 7, 2021

दुनिया

काश के बदल जाती मेरे शब्दों से दुनिया
बड़ी खूबसूरती से सहेज लेता मैं दुनिया
खा लेता चांद समझ रोटी मैं तुझे
गर मां थाली में पड़ोस देती न दुनिया
तमाशे बड़े देखता हूं जहां में
नजारें भी गजब दिखती है दुनिया
हरारतें अपनी मिटा लेने के बाद
नामुराद समझ लेती है दुनिया
नाराज गर हो जाए सब अपने
तो दिलशाद हो जाती है दुनियां
काश के बदल जाती मेरे शब्दों से दुनियां
बड़ी खूबसूरती से सहेज लेता मैं दुनियां

Tuesday, May 22, 2012

इंतज़ार में नुक्स है 
इंतज़ार में नुक्स है,
इल्म इसका किसको है,
लुफ्त ए इंतज़ार का मज़ा बन  गई 
अजीब सी सजा धड़कने चाहत की 
इंतज़ार ए धड़कन हो गई 
और एक  तुम  हो की ..........हा.

बदल  गए हो तुम  जब  से, जुदा हुए हो तुम,
न  जाने क्यू ये नाराज़गी  है, किस  बात  का गुमां  है 
खबर नहीं तुम्हे के कोई प्यार में तेरे कितना दर दर घुमा है,
खामोश  हो तुम पर इधर अजीब सी हलचल  है 
क्यू  कोई इबादत  करे 
कोई क्यू  तुमको पूजे 
नीम  सजदे में क्यू  कोई झुके 
कैसे चले कोई इन  राहो पे,
जिस पे हर  पग  पत्थर  दिल  सनम  मिले 
उफ़  कितनी विसम्ताओ  से भरा है ये जीवन 
उस  पर दुविदा जीने की 
क्या जुल्म है ये 
क्या सितम है ये 

Friday, April 15, 2011

अ ब्लैकहोल

हर इंसान की जिंदगी में, जिंदगी के बाद और मौत के ठीक पहले आता है ये "ब्लैकहोल" जिसमे हर इंसान को जाना ही होता है।

Friday, March 5, 2010

आदमी!

आदमखोर क्यूँ हो गये, हम फिर से आदमी!
आदमयुग में जाने लगे, हम फिर से क्यूँ आदमी!
योजनाए जागरूकता की परोपकारो की
भूलने लगे, हम क्यूँ आदमी!
कही कहावतों कों छोड़,
चलने लगे, हम क्यूँ आदमी!
वेद-पुराणों कों डायन,
कहने लगे, हम क्यूँ आदमी!
ये मैला मन, ये नंगा नाच
करने लगे, हम क्यूँ आदमी!
अंध विश्वासों के सहारे, आंसुओ में
डूबने लगे, हम क्यूँ आदमी!
करतूते इतनी घिनावनी,
करने लगे, हम क्यूँ आदमी!
अपने अहम् कों ऊपर कर
जीने लगे, हम क्यूँ आदमी!
राज्यों,प्रान्तों, में शर्मसार
होने लगे, हम क्यूँ आदमी! 

"ब्लैकहोल!"

दीखता है यहाँ सब, पर एक रंग में
पूरा भी है यहाँ सब, पर एक रंग में
कहने कों सब काला कहते
हर ज़िन्दगी हुई है कैद इस रंग में
अब भी है. आगे भी हो होंगी
जाएँगी सब इस छेद में
समझा कोई,
कोई समझा नहीं
बस उलझता ही चला गया
हर कोई.
इस "ब्लैकहोल!"में
जल्द आ रहा है ये  "ब्लैकहोल!"आपकी कहानी ले कर.

Monday, January 25, 2010

सरताज/

भेज रहा हूँ अल्फाज अपने आपके दरबारे हुजुर
मिल जाये नजरे इनायत " नवी" आपके गुलाम कों
मैं अकेला नहीं जी रहा हूँ,दोजक से इस जहाँ कों
बना दो पल में हीरा तुम,मिट्टी के इन्शान कों
यु ही सब कहते नहीं है, जहाँ के हो "खुदाया" तुम
मुल्के अरब में रहते हो। बसते हो हर मन में तुम
दिल के,मन की, चिलमन की क्या
सुन लेते हो ख़ामोशी कों भी तुम
तुम बिन सब अधुरा सा है
कर दो जहाँ मुक्कमल तुम
आने से पहले क़यामत,होने से पहले ये दुनिया जहनुम
दोजक की आग है "अल्लाह"
बन्दों की फरयाद कों "मौला"
करो न ऐसे नजरे अंदाज तुम
उम्मीद की अर्ज है तुमसे,करदो चिरागे रोशन तुम
नादा हूँ मैं,नादा है मन
दौलत हो इस तन की तुम
नापाक नहीं इरादे मेरे सरताज हो तुम

मैं क्यूँ नज़र होऊं मैं कोई पैगम्बर तो नहीं
यु न सलीब पे चदाओ मुझे या कोई सलीका तो नहीं
माटी हूँ मैं बस खुदाया न बनाओ
चोखट पे रखो अपने मुझे न घर में जाओ
नहीं लायक मैं किसी-किसी लायक तो बनाओ
सांचे में ढालो आग में तपाओ
नहीं लायक मैं किसी-किसी लायक तो बनाओ
हो सके तो मुझे इन्शान बनाओ
परखी नज़रों की है जरुरत, वो नज़र तो लाओ
पल में बना दे जो मिटटी कों हिरा
वो तराशा हुआ सामान तो लाओ
हूँ मैं दबा गम के टेल,
कोई शाकी,पैयामाना, ख़ुशी का पैगाम तो लाओ
बोझल इन हसी फिजाओं में एक हसीं शाम तो लाओ
शदीयों की है शर्दिया यहाँ
कुछ गर्मिया ले आओ
मिल जाऊ अब मं मिटटी में
कोई ऐसी नमी तो ले आओ
मुझे पैगम्बर न बनाओ
मुझे पैगम्बर न बनाओ
 
शहरे नबी में बस जाऊ मैं
शाहे अरब की नज़र पाऊ मैं
मौला मेरे इतना तो कर दो
बन्दे पे अपने करम तो करदो
खड़ा हु बाहर मदीने के कब से
दूर हूँ फिर समंदर के जिसे
मुक्कमल जहा ने किया नज़रअंदाज़
अपना बना लो आका मेरे मुझको आज
अपने करम से नवाजो तुम सब कों
ठीक नहीं तुम भुलादो  जो मुझको
जब से जहा में हम मैं,मैंने कुछ भी न पाया
चाह है तहे दिल से तुमको, तुम ही हो मेरे खुदाया
न आंसू  बहता, न मैं मजबूर हूँ
दर पे तेरे बस मैं कमजोर  हूँ
भर दो दम मुझपे बस इतना करम
बी रुखसत हो तेरे शहर से जाऊ कहा
सब कों छोड़ आया हूँ जब मैं यहाँ
 
 
 
इस संघर्ष भरी ज़िन्दगी कों कुछ बेहतरी से जी तो लू
याद करे कोई रुखसती से पहले कुछ ऐसा कर तो लू
अभिलाषा नहीं है और कोई
चंद खुशियों से कुछ दमन तो भर दू 
अशांत से इस माहोल में थोड़ी सरगमे घोल दू
थका हुआ हर कोई है, चंद लम्हों की रहत तो दू
इस संघर्ष...............